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पन्ना के कोरोना कर्मवीरों को सलाम ,,,,or,,,,कोरोना तुझे क्या कहूं ,, :-टीआई सतीश चतुर्वेदी की भेजी कविता

पन्ना के कोरोना कर्मवीरों को सलाम ,,,,or,,,,कोरोना तुझे क्या कहूं ,, :-टीआई सतीश चतुर्वेदी की भेजी कविता

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हौसला बुलंद करने में जी नहीं है पुलिस अधिकारी

पन्ना में पदस्थ रहे पुलिस अधिकारी सतीश चतुर्वेदी की भेजी गई कविता

हौसले से ही जीत पाएंगे कोरोना की जंग

स्वास्थ्य पुलिस और सफाई कर्मचारियों का अतुलनीय योगदान

पन्ना की कोरोना कर्म वीरों को सलाम

जबसे कोरोना फैला है तब से कोरोना के अलावा पूरे देश में कुछ भी दिखाई और सुनाई नहीं दे रहा है और जिस तरह से यह भयानक विषाणु फैल रहा है इसकी बगैर कुछ सूचना भी लाजमी नहीं है इसकी जंग लड़ रहे स्वास्थ्य , पुलिस और सफाई कर्मचारी अधिकारी दिन रात मेहनत कर रहे हैं लोग खुलकर इनका उत्साह वर्धन भी कर रहे हम आपको इन सभी का ह्रदय से सम्मान करना चाहिए और आभार भी जो खतरे को मोर ले कर यह काम कर रहे हैं जैसे पन्ना में आज हुआ कल्पना कीजिए कि अपनी नौकरी में आपको अचानक परिवार से अलग कर दिया जाए और इस खतरनाक जंग में सीधे लगा दिया जाए कुछ समय के लिए विचलित होना भी स्वाभाविक है और मानव मन क्या कह रहा होगा यह जरा अपने से सोचिए पर इन विषम परिस्थितियों में जो काम कर रहे हैं उनके हौसले की तारीफ करनी चाहिए यही कारण है कि पन्ना में जिन करीब 50 लोगों को होटल में परिवार से अलग भेजा गया है वे इस कोरोना की जंग जीतना चाहते हैं हम आप उन सभी के साहस को सलाम करते हैं और इनकी कार्य का सम्मान भी ऐसे में एक खबर के बाद पन्ना में पदस्थ रहे पुलिस अधिकारी सतीश चतुर्वेदी ने कोरोना तुझे क्या कहूं,, एक कविता भेजी जो मन से अच्छी लगी और आपके लिए भी, यह कविता उनकी मूल कृति है या किसी और की भी जाने पर जिस तरह से प्रकृति को समर्पित यह कविता है निश्चित ही समाज को जागरूक करने वाली है

(साभार-सतीश चतुर्वेदी)

तूही बता तुझे क्या कहूं..??
बीमारी कहूं…
कि बहार कहूं…
पीड़ा कहूं…
कि त्यौहार कहूं…
संतुलन कहूं…
कि संहार कहूं…
अब तूही बता तुझे क्या कहूं..??

मानव जो उद्दंड था..
पाप का प्रचंड था…
सामर्थ्य का घमंड था..

नदियां सारी त्रस्त थी..
सड़के सारी व्यस्त थी..
जंगलों में आग थी..
हवाओं में राख थी..
कोलाहल का स्वर था..
खतरे में जीवो का घर था..
चांद पर पहरे थे..
वसुधा के दर्द बड़े गहरे थे..

फिर अचानक तू आई..
मृत्यु का खौफ लाई..
संसार को डरा गई..
विज्ञान भी घबरा गई..
लोग यूं मरने लगे..
खुद को घरों में भरने लगे..
इच्छाओं को सीमित करने लगे..
प्रकृति से डरने लगे.

अब लोग सारे बंद हैं..
नदियां स्वच्छंद हैं..
हवाओं में सुगंध है..
वनों में आनंद है..
जीव सारे मस्त हैं..
वातावरण भी स्वस्थ हैं..
पक्षी स्वरों में गा रहे..
तितलियां भी इतरा रही..
अब तूही बता तुझे क्या कहूं…??🙏*

✎ शिवकुमार त्रिपाठी (संपादक)
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