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दुखद शांत हुई कड़वी आवाज, तरुण सागर जी के जाने का वक्त नहीं था

दुखद शांत हुई कड़वी आवाज, तरुण सागर जी के जाने का वक्त नहीं था

. दुखद शांत हुई तरुण सागर जी की कड़वी आवाज

यह तरुणसागर जी के जाने का समय नहीं था..

एक और प्रतिभाशाली जैन संत अपनी कट्टर धार्मिक परंपरा के चलते अपने प्राण त्यागने के रास्ते पर जा रहा है। सिर्फ 51 साल की उम्र में जब उनके पास समाज, देश, परिवेश और स्वयं को और बहुत कुछ देने का सही समय था। उपचार योग्य शारीरिक व्याधि ने उनके सामने शरीर त्यागने की प्रक्रिया संल्लेखना से मरने का विकल्प खड़ा कर दिया है। आंशिक एलोपैथी उपचार तो संभवतः वे ले ही रहे हैं लेकिन संपूर्ण एलोपैथिक उपचार जिसमें शल्यक्रिया भी शामिल हो उसे लेने में बहुत बड़ी दुविधा है। वह यह कि इससे वे मुनिपद से वंचित हो जाएंगे। जैनियों के दिगंबर पंथ की मान्यता से सिर्फ 14 साल में घर छोड़ कर मुनि बन जाने के बाद से आज तक की सारी तपस्या का प्रतिफल उनका मुनिपद है। इससे वंचित हों या कि जीवन से यह यक्ष प्रश्न उनके सम्मुख है। सारे जैनेतर संत यहां तक कि श्वेतांबर जैन संत भी दिगंबर जैनसमाज से और मुनि तरुण सागर के आचार्य पुष्पदंत सागर से अपील कर रहे हैं कि तरुणसागर को उपचार का विकल्प देकर संल्लेखना मरण से बचा लिया जाए। …लेकिन चेन्नई में चातुर्मास कर रहे आचार्य पुष्पदंत सागर ने वीडियो मैसेज के जरिए अपने कुछ अन्य मुनि शिष्यों को आदेश दिया है कि वे तरुण सागर को दिल्ली के राधेपुरी स्थित उनके चातुर्मास स्थल ले जाएं। इसका साफ अर्थ है कि तरुण सागर की संल्लेखना की प्रक्रिया आरंभ करने की तैयारी हो रही है।

यह तथ्य भी जान लीजिए कि बुंदेलखंड देश भर में दिगंबर पंथी जैनों की कट्टरता या कहें की रूढ़िवादिता के लिए विश्वभर में चर्चित है। और तरुण सागर बुंदेलखंड के दमोह जिले के एक छोटे से गांव से हैं।… जब देशभर में तरुणसागर के अजीबोगरीब प्रवचनों का डंका बज रहा था तब एक बार और वे गंभीर रूप से अस्वस्थ होकर चलने फिरने से लाचार हो गये थे। तब मुनि रहते हुए वाहन सुविधा ले लेने के कारण बुंदेलखंड की जैनसमाज के एक बड़े हिस्से ने अघोषित और अप्रत्यक्ष रूप से मुनि तरुण सागर को उपेक्षित किया था। कहने की आवश्यकता नहीं है कि इस सब के पीछे बुंदेलखंड, मध्यप्रदेश और तदनन्तर देश भर में फैले कतिपय जैन आचार्य संघों के बीच की प्रतिस्पर्धा और वैमनस्यता भी काम करती है।…यही वजह है कि राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अपनी मिट्टी में पैदा हुई एक शख्सियत की प्राणरक्षा के लिए बुंदेलखंड की समाज से एक आवाज भी नहीं उठ रही।

अपने कवच में सुरक्षित महसूस कर रही एक समाज की साक्षरता भले ही सौ प्रतिशत हो चुकी हो लेकिन धार्मिक पिछड़ेपन की हालत यह है कि वह समय के साथ थोड़ा सा भी बदलाव लाकर किसी मुनिको यह रास्ता देने तैयार नहीं कि अपने प्राण व सम्मान बचाते हुए वह अस्थाई तौर पर मुनिपद को त्याग सके। कोई मुनिपद से वंचित हुआ इसे कलंक के रूप में ढोने की प्रथा समाज में कुरीति की तरह व्याप्त है।…कुछ साल पहले ही सागर शहर के एक अन्यतम प्रतिभसंपन्न जैन मुनि क्षमासागर ने पथरी जैसी उपचार योग्य बीमारी से एक दशक तक पीड़ा भोगने के पश्चात ऐसी ही छोटी उम्र में संल्लेखना से प्राण त्यागे। क्षमासागर अपना जो साहित्य छोड़कर गये हैं उसके अध्ययन से पता चलता है कि समाज ने एक मुनि के अलावा भी बहुत कुछ खो दिया है। उनके गुरू चाहते तो छोटे से उपचार का अवकाश देने का आदेश जारी कर सकते थे लेकिन बुंदेलखंड की कठोरतम जैनपरंपरा और इसकी अनुगामी समाज इसकी सामाजिक अनुमति देने के बजाए अंत्येष्टि में एक लाख की भीड़ में चुपचाप खड़े हो जाना पसंद करती है।…

यह सब लिखने के पीछे मेरी कोई धार्मिक आस्था मुझे प्रेरित नहीं कर रही। यह एक ऐसी प्रतिभा की प्राणरक्षा का प्रश्न है जिसे यदि मैं समय पर न लिखता तो शायद स्वयं को आजीवन दोषी ठहराता। वैसे भी बहुत देर हो चुकी है इस प्रकरण में। मैं श्वेतांबर मुनि लोकेश की भावनाओं के साथ हूं। वीडियो में सुन लीजिएगा। सिर्फ बुंदेलखंड के जैनों से ही नहीं सभी से आग्रह है कि सिर्फ प्रार्थना न करें ,तरुणसागर के उपचार के सारे प्रयत्नों का मार्ग प्रशस्त करें। जड़ता छोड़ें।
-रजनीश जैन

✎ शिवकुमार त्रिपाठी (संपादक)
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