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नवरात्र में मां पद्मावती देवी मंदिर में भक्तों की आस्था,,,, मनोकामना होती है पूर्ण,,,, मंदिर का महत्व और चमत्कार

नवरात्र में मां पद्मावती देवी मंदिर में भक्तों की आस्था,,,, मनोकामना होती है पूर्ण,,,, मंदिर का महत्व और चमत्कार

पूरे बुंदेलखंड की आराध्य देवी है मां पद्मावती
नवरात्रि शुरू होते ही भक्तों की भीड़
हर मनोकामना होती है पूर्ण
बड़ी देवन के नाम से मशहूर है मंदिर

मां पद्मावती देवी जिसे हम सब लोग बड़ी देवी के नाम से पहचानते हैं बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं मां के दर्शन करने। यहां पद्मावती शक्तिपीठ है जिसे लेकर मान्यता है कि यहां जो भी मनोकामना की जाती है उसे मां भगवती जरूर पूरा करती है। पन्ना में मां सती के पदम यानि पैर गिरे थे और इसी लिए इस शक्तिपीठ की नाम पद्मावती शक्तिपीठ पड़ा।

यहां मां का जो प्राचीन मंदिर है उसे लेकर मान्यता है कि प्राचीन काल में इस क्षेत्र में पद्मावत नाम के राजा हुए थे जो शक्ति के उपासक थे। उन्होंने अपनी आराध्य देवी मां दुर्गा को पद्मावती नाम से इस प्राचीन मंदिर में स्थापित किया। कालांतर में इस क्षेत्र का नाम इसी मंदिर के कारण पद्मावतीपुरी हुआ, जो बाद में परना और वर्तमान में पन्ना के नाम से पहचाना जाता है। पद्मावती देवी का उल्लेख भविष्य पुराण तथा विष्णु धर्मोत्तर पुराण में भी है। ये मंदिर गौण नरेशों का आराध्यस्थल भी था।


पद्मावती शक्तिपीठ के प्रति भक्तों की असीम श्रद्धा और विश्वास है। भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है।

– पन्ना में किलकिला नदी के पास मां का यह प्राचीन देवी मंदिर है। इस मंदिर को स्थानीय बोली मे बड़ी देवन कहा जाता है।
– मंदिर के पुजारी राम कुमार शुक्ला के अनुसार, नवरात्रि में यहां बड़ा आयोजन होता है और देशभर से भक्त आते हैं।
– इस दौरान मां के दरबार में क्षेत्रीय बुंदेली भजन गीत गाए जाते है। मान्यता है कि देवी पद्मावती के आशीर्वाद के कारण ही पन्ना इतना समृद्ध है।


यहां गिरे थे मां सती के पदम

मां सती भगवान शिव की पहली पत्नी थी। वह राजा दक्ष की बेटी थी जिसने भगवान शिव को अपनी पुत्री से शादी के लिए मना कर दिया था। उनके इंकार के बाद भी मां सती ने भगवान शिव से शादी की। एक दिन दक्ष राजा ने बड़े यज्ञ का आयोजन किया। उन्होंने सभी ऋषियों और देवताओ को बुलाया लेकिन भगवान शिव को नहीं आमंत्रित किया क्योंकि वे भगवान शिव को पसंद नहीं करते थे।
मां सती ये अपमान नहीं सहन नहीं कर पायी। जब वे पिता से इसका उत्तर जानने यज्ञ स्थल पहुंची तो पिता ने उनका अपमान किया भगवान शिव को भला बुरा कहा। मां सती अपने पति भगवान शिव का अपमान सहन नहीं कर पायी और उन्होंने अपने आप को यज्ञ की अग्नि में भस्म कर दिया।
जब भगवान शिव को इस बारे में पता चला तो क्रोधित शिव ने यज्ञ को नष्ट कर दिया और राजा दक्ष को मार डाला। इसके बाद भगवान शिव मां सती को अपने कंधे पर बिठाकर सम्पूर्ण भूमंडल पर विचरण करने लगे। भूमंडल को स्थिर रखने के लिए भगवान विष्णु ने पीछे से अपने सुदर्शन चक्र से मां सती के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। जिस-जिस स्थान पर मां भगवती के शरीर के टुकड़े गिरे, उन स्थानों पर शक्तिपीठ स्थापित हुए। पन्ना में मां के दाहिना पैर गिरा था, इस कारण इस शक्तिपीठ का नाम पद्मावती शक्तिपीठ के नाम से जाना जाता है।

पन्ना, मैहर और पबई का चमत्कारिक त्रिकोण

पन्ना शक्तिपीठ और मैहर की शारदा माता का मंदिर और पबई की कालिका माता का मंदिर अपने आप में समानांतर त्रिकोण बनाते हैं। पन्ना से पबई की दूरी 45 किलोमीटर और पबई से मैहर की दूरी 45 किलोमीटर है यानि ये तीनों स्थानों की आपस में दूरी 45 किलोमीटर है। इस तरह ये तीनों देवी स्थान आपस में त्रिकोणीय समानांतर कोण बनाते हैं।

9 वी सदी से प्राचीन का शिलालेख

मंदिर के ईशान कोण में एक चबूतरे में पत्थर गड़ा हुआ है जिसमें शिलालेख ब्राम्ही लिपि में लिखा गया है जो अपाठ्य है 925 ईस्वी में तुर्की यात्री इन एक वरदान ने अपने यात्रा अभिलेख में इस मंदिर का वर्णन किया है जिसमें अपनी यात्रा की कालिंजर से आगे पढ़ना नामक स्थान बताया है और लिखा यहां गोल राजाओं की एक कुल पूज्य देवी है जिस पर सभी की आस्था है यानी यह अत्यंत प्राचीन स्थान है और इतिहासकारों ने यहां की लाली अभिलेख और प्राचीनता को उतना महत्व नहीं दिया जितने प्राचीन है

✎ शिवकुमार त्रिपाठी (संपादक)
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