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छत्रसाल जयंती ,,बधाई ,, बुंदेलकेशरी को याद कर दी पुष्पांजलि

छत्रसाल जयंती ,,बधाई ,, बुंदेलकेशरी को याद कर दी पुष्पांजलि


खजुराहो सांसद बीडी शर्मा ने दी बधाई

छत्रसाल अद्भुत पराक्रमी योद्धा - बृजेंद्र प्रताप सिंह

महाराज छत्रसाल का चरित्र अनुकरणीय,, बुंदेलखंड की सुरक्षा के हिमायती थे महाराजा :- धीरेंद्र सिंह परमार

(शिवकुमार त्रिपाठी)
बुंदेल केशरी महाराजा छत्रसाल की जयंती पर पन्ना के छत्रसाल पार्क में उन्हें याद कर पुष्पांजलि अर्पित की गई पन्ना विधायक बृजेंद्र प्रताप सिंह के साथ प्रणामी समाज के लोगों ने पहुंच कर महाराजा बुंदेल केसरी छत्रसाल की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया और दीप जलाकर आरती उतारी, समाज के चुनिंदा लोगों ने सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए आज जयंती मनाई पूरा बुंदेलखंड आज अद्भुत पराक्रमी योद्धा को याद कर रहा है खजुराहो से सांसद एवं भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा ने छत्रसाल जयंती पर सभी को बधाई दी है और उन्होंने छत्रसाल को याद करते हुए कहा बुंदेलखंड को बचाने में महाराजा छत्रसाल का सबसे बड़ा योगदान था उनका जीवन हम सबके लिए मार्गदर्शन है

इस बीच पन्ना विधायक एवं पूर्व मंत्री बृजेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि महाराजा छत्रसाल अद्भुत पराक्रमी योद्धा थे और उनके राज्य में हर व्यक्ति सुरक्षित था जब भी संकट आया उन्होंने पूरे बुंदेलखंड को अपने पराक्रम से सुरक्षित किया
मध्य प्रदेश के अतिरिक्त महाधिवक्ता धीरेंद्र सिंह परमार ने भी महाराजा छत्रसाल को याद किया और कहा की महाराजा छत्रसाल का चरित्र अनुकरणीय है क्षत्रिय समाज ही नहीं सभी समाज के लोग महाराजा छत्रसाल को याद करते हैं उन्होंने कहा की छत्रसाल जी जिस प्रसिद्धि के हकदार थे उनका इतिहास इस देश में प्रचारित नहीं किया गया लेकिन बुंदेलखंड के हर व्यक्ति की आत्मा महाराजा छत्रसाल के लिए धड़कती है

पुरानी समाज के लोगों ने पहुंचकर महाराजा छत्रसाल की प्रतिमा विवाद माल्यार्पण किया और उनकी वीरता और प्रसिद्धि को याद कर श्रद्धा सुमन अर्पित किए जिले के वरिष्ठ अधिवक्ता एवं भाजपा नेता विनोद तिवारी , वरिष्ठ समाजसेवी एवं प्रणामी समाज के लक्ष्मीकांत शर्मा सहित प्रमुख लोग मौजूद रहे

छत्रसाल का परिचय और पराक्रम

महाराजा छत्रसाल की वीरता, चातुर्यपूर्ण नीति और कौशल का कोई सानी नहीं था। जिसके बल पर उन्होंने अनेक बार मुगल शासकों को हार का स्वाद चखाया। युद्ध में उनका मुकाबला करने से पहले 100 बार सोचना पड़ता था।

परिवार से मिला प्रोत्साहन
बुंदेलखंड के शिवाजी के नाम से प्रख्यात छत्रसाल का जन्म ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया (3) संवत 1706 विक्रमी तदनुसार दिनांक 17 जून 1648 ईस्वी को पहाड़ी ग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम चम्पराय और मां का नाम लालकुंवरी था। उनके पिता भी चम्पतराय वीर व बहादुर थे। चम्पतराय के साथ युद्ध में लालकुंवरी भी साथ रहती। इस दौरान पति का युद्ध क्षेत्र में उत्साहवर्धन करती। तब छत्रसाल अपनी मां के गर्भ में थे। मां लालकुंवरी की शिक्षा ने छत्रसाल को बहादुर और युद्ध कौशल में निपुण बनाया।

दस वर्ष की आयु में बन गए थे कुशल सैनिक
छत्रसाल अस्त्र-शस्त्र और युद्ध कला की शिक्षा मामा के यहां मिली। महज दस वर्ष की आयु में ही छत्रसाल कुशल सैनिक बन गए थे। 16 वर्ष की आयु में छत्रसाल को माता-पिता से दूर होना पड़ा। उनकी जागीर छिन गई। लेकिन विषम परिस्थिति और कम आयु के बाद भी छत्रसाल ने विवेक और धैर्य से काम लिया। अपनी मां के गहने बेंचे। एक छोटी सी सेना बनाई। दुश्मनों से छोटे-छोटे युद्ध लड़ते अपना रास्ता तैयार करते रहे। फिर छोटी-छोटी रियासतों को वीरता पूर्वक जीता। धीरे-धीरे अपने राज्य की सीमा का विस्तार करते रहे। एक समय ऐसा भी आया जब छत्रसाल की युद्ध और सैन्य संचालन की कुशल नीति के आगे औरंगजेब की सेना को भी हार माननी पड़ी।

स्नेह के बल पर जीता जनता का विश्वास
छत्रसाल ने स्नेह के बल पर बुंदेलखण्ड की प्रजा से विश्वास जीता। छत्रसाल सभा में विद्वानों को सम्मानित करते थे। बुंदेलखण्ड का छतरपुर नगर महाराजा छत्रसाल का बसाया है। छत्रसाल की राजधानी महोबा थी। महाराजा छत्रसाल की 83 वर्ष की आयु में 14 दिसंबर 1731 ईस्वी को मृत्यु हुई।

छत्रसाल का राज्य

इत यमुना उत नर्मदा इत चंबल उत टोंस ।
छत्रसाल सों लरन की रही न काहू हौंस॥

छत्रसाल बुन्देला अपने समय के महान शूरवीर, संगठक, कुशल और प्रतापी राजा थे। छत्रसाल बुन्देला को अपने जीवन की संध्या में भी आक्रमणों से जूझना पडा। 1729 में सम्राट मुहम्मद शाह के शासन काल में प्रयाग के सूबेदार बंगस ने छत्रसाल पर आक्रमण किया। उसकी इच्छा एरच, कोंच(जालौन), सेवड़ा, सोपरी, जालौन पर अधिकार कर लेने की थी। छत्रसाल को मुग़लों से लड़ने में दतिया, सेवड़ा के राजाओं ने सहयोग नहीं दिया। तब छत्रसाल बुन्देला ने बाजीराव पेशवा को संदेश भेजा –

जो गति मई गजेन्द्र की सोगति पहुंची आय
बाजी जात बुन्देल की राखो बाजीराव

बाजीराव सेना सहित सहायता के लिये पहुंचा । क्षत्रसाल और बाजीराव ने बंगस को 30 मार्च 1729 को पराजित कर दिया। बंगस हार कर वापिस लौट गया।

पूरे बुंदेलखंड में महाराजा छत्रसाल की दंतकथा हर व्यक्ति की जुबान में रहती हैं

✎ शिवकुमार त्रिपाठी (संपादक)
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