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कलेक्टर कर्मवीर शर्मा की पहल पर आदिवाशी बालिका को मिला इलाज,,, 2 दिन पूर्व टूटा था हाथ

कलेक्टर कर्मवीर शर्मा की पहल पर आदिवाशी बालिका को मिला इलाज,,, 2 दिन पूर्व टूटा था हाथ

लेक्टर कर्मवीर शर्मा की पहल पर बालिका को मिला इलाज
2 दिन पूर्व टूट गया था हाथ
लॉक डाउन कारण नहीं पहुंच पा रही थी अस्पताल
बड़ी कष्ट भरी है दास्तान
एनजीओ के लोग हाय मदद में सामने

2 दिन पूर्व झूले से गिरने के बाद हाथ टूटने से परेशान और लॉक डाउन के कारण आदिवासी बालिका का अस्पताल तक नहीं पहुंच पा रही थी और सरकारी मदद भी नहीं मिल पा रही थी तब इसकी जानकारी कलेक्टर कर्मवीर शर्मा को लगी तो उन्होंने मामले को गंभीरता से लिया और तत्काल मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी एलके तिवारी को तत्काल इलाज के लिए व्यवस्था करने के आदेश दिए तब एंबुलेंस कटेहरी बिलाडा पहुंची और उस बालिका को लेकर अस्पताल आई जिसे जिला चिकित्सालय में भर्ती कराया गया है
एक एनजीओ के वालंटियर निकिता डिक्रूज और सौरव वर्मा ने मीडिया के माध्यम से बात कलेक्टर तक पहुंचाई और कलेक्टर ने मामले को बड़ी गंभीरता से लिया


दर्द भरी दास्तान

5 साल की बच्ची जिसका नाम कल्पना है, जो कटहरी-बिलहाटा पंचायत, अमानगंज तहसील वह परसों 27 मार्च 2020 अपने गांव में एक झूले से गिर गई जिसके कारण कि उसके दोनों हाथों में गंभीर चोट आई। कल्पना की मां सोना ने बताया कि उसका हाथ सूज गया है और बहुत ज्यादा दर्द है । बच्ची की दोनों हाथ टूट गई है । बड़ी मुश्किल से अगले दिन 28 मार्च को पुलिस के रोकने के बावजूद वे लोग अमानगंज सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंच गए जहां उनको कुछ पेन किलर और मलहम देकर पन्ना जाने को कहा। अगले दिन 29 मार्च को 8:00 बजे गांव के किसी बाइक वाले को मनाकर पन्ना अस्पताल के लिए निकल गए क्योंकि एंबुलेंस गाड़ी की व्यवस्था नहीं हो पाई । जब वह लोग पिपरवाह पहुंचे तो उनको पुलिस के द्वारा रोका गया और डांट डपट कर वापस भेज दिया गया। वह लोग रास्ता बदलकर द्वारी के रास्ते से गए वहां भी उनको वापस भेज दिया गया ऐसा बोलकर कि सरकारी गाड़ी होगी तभी जाने दूंगा । फिर वह लोग अपने गांव वापस आ गए और कोशिका संस्था को संपर्क किया। 10:00 बजे से वह लोग एंबुलेंस को कॉल लगाते रह गए लेकिन एंबुलेंस ने कई बार मना कर दिया यह कहते हुए की सारी गाड़ी व्यस्त है । मां बेचारी परेशान और रो रही थी क्योंकि वह अकेली थी बच्ची के पिता का कुछ समय पहले ही देहांत हो गया था और उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। कोशिका संस्था के टीम को भी एंबुलेंस ने मना कर दिया। सीएमएचओ को संपर्क करने के बाद भी उन्होंने कॉल नहीं उठाया । लेकिन बार-बार संपर्क करने पर एंबुलेंस 2:00 बजे के करीब जाने को तैयार हुई । जंगल का रास्ता था तो एंबुलेंस ने भी कहा कि हम कुछ ही दूर तक जा सकेंगे , कुछ दूर परिवार पैदल चलकर आया बच्ची को लेते हुए और फिर कुछ दूर तक एंबुलेंस आई और एंबुलेंस 7 घंटे बाद और 2 दिन दर्द झेलने के बाद 3:30 बजे उनके गांव पहुंची । मां काफी परेशान थी कि जब गाड़ी आने में इतनी समस्या हुई तो अस्पताल जाकर कितनी समस्या होगी । कल्पना 2 दिन से दर्द के मारे तड़प रही थी और बगैर इलाज के उसका दर्द बढ़ता चला गया। ऐसे कई लोग हमारे ग्रामीण क्षेत्र में होंगे जिनको ऐसी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा होगा इस लॉक डाउन के कारण और पुलिस को आम जनता से बिना पूछताछ किए हुए डराने के कारण। लॉक डाउन तो होना चाहिए किंतु साथ में जो सुविधाएं हैं उनको भी सटीक तरीके से होना चाहिए ताकि हमारे ग्रामीण क्षेत्र में या फिर आदिवासी क्षेत्र में जो लोग हैं उनको परेशानी ना झेलना पड़े। हम और आप तो सोशल डिस्टेंसिंग कर रहे लेकिन बेचारे यह गरीब कहां जाए, किसका सहारा ले ?

✎ शिवकुमार त्रिपाठी (संपादक)
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